संघर्ष का स्वरूप


✍️ अनिल रूषी तुलकाने

कोशिश कर या न कर, यहाँ नसीब का भी खेल होता है,

किसी को सजी थाल मिलती है, तो किसी का सब कुछ बिखर जाता है।

पर गौर से देख ऐ दोस्त, संघर्ष दोनों का एक-सा होता है,

कोई अपनी थाल सजाने को, तो कोई उसे बचाने को लड़ता है।

फासले रास्तों के अलग सही, पर पसीना दोनों का सच्चा है,

मंज़िल पाने की हो या उसे बचाने की—हर कदम पर संघर्ष सच्चा है।

किसी के हाथों में उम्मीदें हैं, तो कोई यादों को थामे रहता है,

कोई भविष्य के लिए लड़ता है, तो कोई आज को संभाले रहता है।

ये ज़िंदगी एक रणभूमि है, यहाँ हर कोई योद्धा बनता है,

जीत किसी की भी हो जाए, पर संघर्ष सबका एक-सा लगता है।

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