तृष्णा का चक्र
जीवन एक प्रवाह है, और तृष्णा उसका सबसे गहरा भंवर। बुद्ध ने जिसे ‘दुःख का कारण’ कहा, वह हमारे हर श्वास में, हर चाह में छुपी है। प्रस्तुत कविता ‘तृष्णा का चक्र’ उसी अंतहीन प्यास को टटोलती है — शरीर की, मन की, और उस भ्रम की जिसे हम प्रेम समझ बैठते हैं। यहाँ शब्द नहीं, एक अनुभव बोल रहा है। पढ़िए, और खुद से पूछिए — क्या मेरी तृष्णा का दीप भी बुझा है? तृष्णा का चक्र ✍️ अनिल रूषी तुलकाने यहाँ मृत्यु का भय हर श्वास में छुपा है, जबकि सत्य यह है—जीवन स्वयं ही दुःख का रूप है। फिर भी तृष्णा का दीप बुझता नहीं, हर क्षण जीने की चाह भीतर जलती ही रहती है। यह शरीर—दुःख का पात्र, भोग का साधन, और मन—अशांत, एक अंतहीन स्पंदन। कम्बख्त यह शरीर—सुनता कहाँ है, अपनी ही तृष्णा में हर पल जलता रहा है। इश्क का भ्रम रच, मन को बहलाता है, और चाहत को ही प्रेम समझ बैठता है। प्यार के नाम पर दिल को भटका देता है, असल में यह सब—स्वयं की ही इच्छा का जाल होता है। आँखें रूप में सुख ढूँढती हैं, जीभ स्वाद में क्षणिक तृप्ति खोजती है, पेट भरता है, पर चाह नहीं भरती, मन की प्यास और गहरी होती जाती है। यह सब एक प्रवाह है—क्षणभंगुर...