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तृष्णा का चक्र

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जीवन एक प्रवाह है, और तृष्णा उसका सबसे गहरा भंवर। बुद्ध ने जिसे ‘दुःख का कारण’ कहा, वह हमारे हर श्वास में, हर चाह में छुपी है। प्रस्तुत कविता ‘तृष्णा का चक्र’ उसी अंतहीन प्यास को टटोलती है — शरीर की, मन की, और उस भ्रम की जिसे हम प्रेम समझ बैठते हैं। यहाँ शब्द नहीं, एक अनुभव बोल रहा है। पढ़िए, और खुद से पूछिए — क्या मेरी तृष्णा का दीप भी बुझा है?  तृष्णा का चक्र ✍️ अनिल रूषी तुलकाने यहाँ मृत्यु का भय हर श्वास में छुपा है, जबकि सत्य यह है—जीवन स्वयं ही दुःख का रूप है। फिर भी तृष्णा का दीप बुझता नहीं, हर क्षण जीने की चाह भीतर जलती ही रहती है। यह शरीर—दुःख का पात्र, भोग का साधन, और मन—अशांत, एक अंतहीन स्पंदन। कम्बख्त यह शरीर—सुनता कहाँ है, अपनी ही तृष्णा में हर पल जलता रहा है। इश्क का भ्रम रच, मन को बहलाता है, और चाहत को ही प्रेम समझ बैठता है। प्यार के नाम पर दिल को भटका देता है, असल में यह सब—स्वयं की ही इच्छा का जाल होता है। आँखें रूप में सुख ढूँढती हैं, जीभ स्वाद में क्षणिक तृप्ति खोजती है, पेट भरता है, पर चाह नहीं भरती, मन की प्यास और गहरी होती जाती है। यह सब एक प्रवाह है—क्षणभंगुर...

बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व

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 शीर्षक: बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व प्रस्तावना: "सत्य की खोज किसी एक मार्ग की मोहताज नहीं होती, लेकिन जब एक ही सत्य के अनेक मार्ग बन जाएँ, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।" महाकारुणिक तथागत बुद्ध ने प्रज्ञा, शील और करुणा का जो मार्ग दिखाया था, वह बेहद सरल और स्पष्ट था। वह मार्ग था स्वयं को जानने का, दुखों से मुक्ति का। लेकिन समय की धारा के साथ, उनके अनुयायियों ने अपनी-अपनी समझ और व्याख्याओं के अनुसार अलग-अलग 'यान' और 'संप्रदाय' बना लिए। आज जब हम बुद्ध के संदेश को देखते हैं, तो वह कई धाराओं में बंटा हुआ नज़र आता है। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि क्या बुद्ध ने यही चाहा था? क्या 'धम्म' का मूल तत्व इन विभाजनों में कहीं खो गया है? कवि अनिल रूषी तुलकाने की यह कविता किसी संप्रदाय या मत की आलोचना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज में उठे कुछ गहरे और निश्छल प्रश्न हैं। यह कविता हमें कर्मकांडों से ऊपर उठकर बुद्ध के विचारों को सही अर्थों में आत्मसात करने की प्रेरणा देती है। कविता: ✍️ अनिल रूषी तुलकाने (सत्य की खोज में उठे प्रश्न) बुद्ध ने क्या सोचा था—विचार यूँ बँट जाएँगे, ...

सौंदर्यांची चे दोन पैलू

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  या जगात 'विश्व सुंदरी' हा किताब जितका प्रसिद्ध आहे, तितकी चर्चा 'विश्व सुंदरा'ची का होत नाही? यामागे निसर्गाचा एक मोठा तर्क दडलेला आहे. १. स्त्री: सौंदर्याची खाण आणि कोमलता निसर्गाने स्त्रीला घडवताना त्यात नजाकत आणि कोमलता भरली आहे. तिचे सौंदर्य चंद्राच्या शीतलतेसारखे असते. २. पुरुष: एक अभेद्य पर्वत पुरुष सौंदर्यापेक्षा त्याच्या भव्यतेसाठी आणि कणखरपणासाठी ओळखला जातो. पुरुष म्हणजे एक पर्वत कठोर  विशेष कविता: सौंदर्याचे दोन पैलू ✍️ अनिल रूषी तुलकाने निसर्गाच्या लेखणीचे दोन वेगळे रंग, एक कोमल चांदणं, तर एक वादळाचा संग। स्त्री म्हणजे नाजूक फुलांची हळवी नजाकत, पुरुष म्हणजे शांत धैर्याची अथांग ताकद। तिच्या रूपात दडलेली विश्वाची मोहकता, त्याच्या श्रमात सापडते जीवनाची सार्थकता। ती भावनांनी रंगवते प्रत्येक क्षण, तो स्वप्नांना देतो भक्कम पायाभरण। म्हणूनच नाही कुणी श्रेष्ठ, नाही कुणी कमी, दोघांच्या संगतीतच पूर्ण होते ही सृष्टी थामी। ती “सुंदरी” म्हणून ओळखली जाते, तो “शौर्य” म्हणून मानला जातो, पण खरं सांगायचं तर ‘अनिल’, दोघांमुळेच जीवन फुलत जातो।

घर की परी

✍️ अनिल रूषी तुलकाने हर पिता की अनमोल दौलत है उसकी प्यारी परी, सपने संजोए, देखभाल करे—वो सबसे सच्ची, सबसे खरी। स्कूल भी संभाले, घर में माँ का हाथ बँटाए, अपने सुख भूलकर हर पल अपनों को अपनाए। अरमान उसके—अपने घर को स्वर्ग बनाए, पराए घर को भी अपना मान, वहाँ खुशियाँ सजाए। किताबों की लौ दिल में, पढ़ाई का अटूट जोश, आगे बढ़कर जग को रोशन करने का उसमें होश। हर रिश्ता वो दिल से निभाए, हर दर्द को चुपचाप सहे, मुस्कान में अपने सारे आँसू, दुनिया से छुपाकर रखे। बेटी का ये त्याग और प्यार जो समझ न पाए, यकीनन इस दुनिया में वो इंसान अज्ञान ही कहलाए।

सुंदरता का पैमाना

✍️ अनिल रूषी तुलकाने सुंदरता मात्र एक विचार है, देखने वाले की आँखों का, हकीकत है या कोई वहम—बस खेल है ये परखने का। हर कोई यहाँ अलग पैमाना लिए बैठा है इस बाज़ार में, सुंदरता की परिभाषा को, अपनी सुविधा से गढ़ने में। किसी को रंगों में मिलती, किसी को सादगी भाती है, किसी को चेहरे में दिखती, किसी को रूह नज़र आती है। जब हर चीज़ को मापने का, नियम बनाया है दुनिया ने, फिर सुंदरता का आकलन, अलग क्यों रखा हर किसी ने? सच तो ये है ऐ दोस्त, नापी नहीं जाती ये तराज़ू से, ये तो एहसास है दिल का, जो झलकता है हर एक अंदाज़ू से। जो दिखता है वो अधूरा है, जो महसूस हो वही सच्चा है, सुंदरता चेहरों में कम, इंसानियत में ज्यादा अच्छा है।

संघर्ष का स्वरूप

✍️ अनिल रूषी तुलकाने कोशिश कर या न कर, यहाँ नसीब का भी खेल होता है, किसी को सजी थाल मिलती है, तो किसी का सब कुछ बिखर जाता है। पर गौर से देख ऐ दोस्त, संघर्ष दोनों का एक-सा होता है, कोई अपनी थाल सजाने को, तो कोई उसे बचाने को लड़ता है। फासले रास्तों के अलग सही, पर पसीना दोनों का सच्चा है, मंज़िल पाने की हो या उसे बचाने की—हर कदम पर संघर्ष सच्चा है। किसी के हाथों में उम्मीदें हैं, तो कोई यादों को थामे रहता है, कोई भविष्य के लिए लड़ता है, तो कोई आज को संभाले रहता है। ये ज़िंदगी एक रणभूमि है, यहाँ हर कोई योद्धा बनता है, जीत किसी की भी हो जाए, पर संघर्ष सबका एक-सा लगता है।

उड़ान का हौसला

 शीर्षक: “उड़ान का हौसला” ✍️ अनिल रूषी तुलकाने उड़ने के लिए पंख तो होते हैं, पर उड़ाने के लिए जोश चाहिए, सपने सामने डेरा डाले हैं, पर उन्हें छूने का हौसला चाहिए। आसमान तो बहुत बड़ा है, बस फड़फड़ाने को मन चाहिए, मंज़िलें खुद रास्ता दिखा देंगी, अगर समझने को अक्ल चाहिए। हवा भी साथ देती है उसी का, जिसमें आगे बढ़ने का इरादा हो, वरना पंख होते हुए भी कई लोग, ज़मीन पर ही रह जाते हैं—ये भी एक सच्चा फसाना हो। डर की दीवारें तो हर किसी के रास्ते में आती हैं, पर जो पार कर जाए वही असली उड़ान पाता है, ख्वाब तो सबके पास होते हैं इस दुनिया में, पर उन्हें जीने का साहस हर किसी में कहाँ आता है। गिरकर संभलना ही असली हुनर है, यही जिंदगी का असली सबक सिखाता है, जो खुद पर यकीन कर ले एक बार, वही आसमान में अपना नाम लिख जाता है