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मे, २०२६ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

तृष्णा का चक्र

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जीवन एक प्रवाह है, और तृष्णा उसका सबसे गहरा भंवर। बुद्ध ने जिसे ‘दुःख का कारण’ कहा, वह हमारे हर श्वास में, हर चाह में छुपी है। प्रस्तुत कविता ‘तृष्णा का चक्र’ उसी अंतहीन प्यास को टटोलती है — शरीर की, मन की, और उस भ्रम की जिसे हम प्रेम समझ बैठते हैं। यहाँ शब्द नहीं, एक अनुभव बोल रहा है। पढ़िए, और खुद से पूछिए — क्या मेरी तृष्णा का दीप भी बुझा है?  तृष्णा का चक्र ✍️ अनिल रूषी तुलकाने यहाँ मृत्यु का भय हर श्वास में छुपा है, जबकि सत्य यह है—जीवन स्वयं ही दुःख का रूप है। फिर भी तृष्णा का दीप बुझता नहीं, हर क्षण जीने की चाह भीतर जलती ही रहती है। यह शरीर—दुःख का पात्र, भोग का साधन, और मन—अशांत, एक अंतहीन स्पंदन। कम्बख्त यह शरीर—सुनता कहाँ है, अपनी ही तृष्णा में हर पल जलता रहा है। इश्क का भ्रम रच, मन को बहलाता है, और चाहत को ही प्रेम समझ बैठता है। प्यार के नाम पर दिल को भटका देता है, असल में यह सब—स्वयं की ही इच्छा का जाल होता है। आँखें रूप में सुख ढूँढती हैं, जीभ स्वाद में क्षणिक तृप्ति खोजती है, पेट भरता है, पर चाह नहीं भरती, मन की प्यास और गहरी होती जाती है। यह सब एक प्रवाह है—क्षणभंगुर...

बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व

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 शीर्षक: बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व प्रस्तावना: "सत्य की खोज किसी एक मार्ग की मोहताज नहीं होती, लेकिन जब एक ही सत्य के अनेक मार्ग बन जाएँ, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।" महाकारुणिक तथागत बुद्ध ने प्रज्ञा, शील और करुणा का जो मार्ग दिखाया था, वह बेहद सरल और स्पष्ट था। वह मार्ग था स्वयं को जानने का, दुखों से मुक्ति का। लेकिन समय की धारा के साथ, उनके अनुयायियों ने अपनी-अपनी समझ और व्याख्याओं के अनुसार अलग-अलग 'यान' और 'संप्रदाय' बना लिए। आज जब हम बुद्ध के संदेश को देखते हैं, तो वह कई धाराओं में बंटा हुआ नज़र आता है। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि क्या बुद्ध ने यही चाहा था? क्या 'धम्म' का मूल तत्व इन विभाजनों में कहीं खो गया है? कवि अनिल रूषी तुलकाने की यह कविता किसी संप्रदाय या मत की आलोचना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज में उठे कुछ गहरे और निश्छल प्रश्न हैं। यह कविता हमें कर्मकांडों से ऊपर उठकर बुद्ध के विचारों को सही अर्थों में आत्मसात करने की प्रेरणा देती है। कविता: ✍️ अनिल रूषी तुलकाने (सत्य की खोज में उठे प्रश्न) बुद्ध ने क्या सोचा था—विचार यूँ बँट जाएँगे, ...