तृष्णा का चक्र
तृष्णा का चक्र
✍️ अनिल रूषी तुलकाने
यहाँ मृत्यु का भय हर श्वास में छुपा है,
जबकि सत्य यह है—जीवन स्वयं ही दुःख का रूप है।
फिर भी तृष्णा का दीप बुझता नहीं,
हर क्षण जीने की चाह भीतर जलती ही रहती है।
यह शरीर—दुःख का पात्र, भोग का साधन,
और मन—अशांत, एक अंतहीन स्पंदन।
कम्बख्त यह शरीर—सुनता कहाँ है,
अपनी ही तृष्णा में हर पल जलता रहा है।
इश्क का भ्रम रच, मन को बहलाता है,
और चाहत को ही प्रेम समझ बैठता है।
प्यार के नाम पर दिल को भटका देता है,
असल में यह सब—स्वयं की ही इच्छा का जाल होता है।
आँखें रूप में सुख ढूँढती हैं,
जीभ स्वाद में क्षणिक तृप्ति खोजती है,
पेट भरता है, पर चाह नहीं भरती,
मन की प्यास और गहरी होती जाती है।
यह सब एक प्रवाह है—क्षणभंगुर, अनित्य,
जहाँ कुछ भी स्थिर नहीं—सब बदलता है नित्य।
शरीर और भावना—दो नहीं, एक ही धारा हैं,
जैसे लहर और सागर—अलग दिखते, पर एक ही सहारा हैं।
जहाँ ‘मैं’ का भ्रम मिटने लगता है,
वहीं शांति का दीप जलने लगता है।
तृष्णा जब शांत होती है,
तभी दुःख का चक्र थमता है—
और वहीं से मुक्ति का मार्ग जन्म लेता है।
शब्द नहीं, अनुभव बोलते हैं यहाँ… अनिल लिखता नहीं—अंदर का बोध बोलता है। —अनिल रूषी तुलकाने

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