बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व


 शीर्षक: बुद्ध, धम्म और समय का द्वंद्व

प्रस्तावना:

"सत्य की खोज किसी एक मार्ग की मोहताज नहीं होती, लेकिन जब एक ही सत्य के अनेक मार्ग बन जाएँ, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।"

महाकारुणिक तथागत बुद्ध ने प्रज्ञा, शील और करुणा का जो मार्ग दिखाया था, वह बेहद सरल और स्पष्ट था। वह मार्ग था स्वयं को जानने का, दुखों से मुक्ति का। लेकिन समय की धारा के साथ, उनके अनुयायियों ने अपनी-अपनी समझ और व्याख्याओं के अनुसार अलग-अलग 'यान' और 'संप्रदाय' बना लिए।

आज जब हम बुद्ध के संदेश को देखते हैं, तो वह कई धाराओं में बंटा हुआ नज़र आता है। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि क्या बुद्ध ने यही चाहा था? क्या 'धम्म' का मूल तत्व इन विभाजनों में कहीं खो गया है?

कवि अनिल रूषी तुलकाने की यह कविता किसी संप्रदाय या मत की आलोचना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज में उठे कुछ गहरे और निश्छल प्रश्न हैं। यह कविता हमें कर्मकांडों से ऊपर उठकर बुद्ध के विचारों को सही अर्थों में आत्मसात करने की प्रेरणा देती है।

कविता:

✍️ अनिल रूषी तुलकाने

(सत्य की खोज में उठे प्रश्न)

बुद्ध ने क्या सोचा था—विचार यूँ बँट जाएँगे,

अपने ही अनुयायी अलग-अलग यान बना जाएँगे।

अपने-अपने मत लेकर, धम्म को समझते गए,

शुद्ध प्रकाश के दीप को, हिस्सों में बाँटते गए।

अगर होते गौतम बुद्ध आज, तो किस राह के साथ होते?

या अपनी ही वाणी के बँटवारे पर मौन रोते?

प्रज्ञा, शील और करुणा—सबमें एक ही तत्व है,

फिर क्यों इन मार्गों में इतना अलग महत्व है?

जब सूरज एक ही है, तो किरणें जुदा क्यों हैं?

रोशनी तो एक ही है, फिर ये परछाइयाँ क्यों हैं?

जब धम्म एक ही है, तो मन में ये दंग क्यों हैं?

शांति के इस सागर में उठते ये जंग क्यों हैं?

बुद्ध ने तो बोया था एक बीज सत्य का,

वक्त की मिट्टी ने उसे कई शाखों में ढाल दिया।

क्या देखा था उन्होंने भविष्य का वो मंज़र?

या समय ने ही उनके स्वर को मोड़ दिया इस कदर?

मिट्टी के चरणों को छूने से अँधेरा नहीं मिटता,

जो विचारों को न अपनाए—वो शिष्य नहीं दिखता।

बुद्ध की शरण का अर्थ—खुद की खोज में खो जाना,

चरणों में झुककर नहीं, उनके जैसा बनकर दिखाना।

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