रिश्ते की मौत

कुछ रिश्ते टूटते नहीं,बस अंदर से मर जाते हैं।शोर नहीं होता,कोई दरक नहीं उठता,बस एक साँस रुक जाती है,और दूसरा नाटक शुरू हो जाता है।
जहाँ पत्नी पति के साथ नहीं खड़ी,वहाँ साथ सिर्फ एक देहरी का नाम है।दिखावा इतना सँवरा होता हैकि खुद घर वालों को यकीन रह जाता है— हम सही हैंकदम तो मिलते हैं राहों में,पर दिलों में हजार कोस की दूरी है।एक तरफ निभाने की थकान है,दूसरी तरफ उठाने की मजबूरी।यह प्यार नहीं,समाज से बचने की चतुराई है।
इज्जत के नाम पर ओढ़ लियारिश्तों का वह झूठा लिबास।अंदर का सब खोखला निकला,बाहर बना रखा है अटूट विश्वास।
न आँखों में अपनापन बचा है,न लफ्जों में वह नरमी रही।बस एक छत के नीचे —दो अजनबियों की जर्जर गृहस्थी रही।वह बदनामी से डरता है,या शायद अकेलेपन से।प्यार के नाम पर जिसे ढो रहा है,वह तो सिर्फ जनता के सामनेघर दिखाने का कौशल है।कोई रिश्ता तलाक से नहीं टूटता।रिश्ता तो बहुत पहले मर जाता है —जिस दिन कोई पूछता है,"तुम ठीक हो?"और सामने से सिर्फ सन्नाटा आता है।
बस लोग घसीटते रहते हैं,क्योंकि समाज कमरे में घुसकर पूछता है:"तुमने त्याग क्यों नहीं किया?"रिश्ता वहीं जीता है,जहाँ साथ में सम्मान साँस लेता है।वरना उस घर में, जहाँ एक बिस्तर में दो शरीर हों,और दो अलग-अलग सपने हों —वहाँ इंसान बुढ़ापे तकउसी अकेलेपन का ढकोसला ढोता है।

और अंत में —शायद यही सच है:रिश्तों का बोझउठाने वाला भी अकेला होता है,और ना उठाने वाला भी।

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